pills viagraviagrageneric viagra 100mgviagra cheapviagra 100 mg !! गुरु भभूता सिद्ध जोतराम गोदारा महाराज !!
[3:50 pm, 29 Jan 2011 | 110 Comments | 17,721 views]
जय बाबा की !!

पवित्र भारत की मात्रभूमि पर समय – समय पर संत महात्माओ व सिद्ध पुरुषों ने अवतरित होकर परोपकार हेतु जनकल्याण किया है!

बाबा का जन्म : संवत 1990 की ज्येष्ठ सुदी दशमी राजस्थान की पावन भूमि पर गाँव भनीण में चौधरी चांदाराम गोदारा (जाट) परिवार में उनके सुपुत्र सुल्तान राम गोदारा के घर किस्तुरी माँ की कोख से जोतराम नाम के बालक का जन्म हुआ | जोतराम बाल्य अवस्था से ही शीतल स्वभाव व शांत प्रवृति के थे धार्मिक विचारों व ईश्वर के प्रति उनका विशेष लगाव था | माता किस्तुरी देवी गाँव गाजावास गड़ाना के चौधरी किसनोराम की पुत्री हैं, जोतराम जी के बाद इनके तीन भाइयों व चार बहनों ने माता किस्तुरीदेवी की कोख से जन्म लिया जिनके नाम झाबर सिंह, चौधरी लादूराम व चौधरी हरिलाल जी हैं तथा बहनें नन्दकोरी, सजना, जडिया व सोना है |

बाबा …



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[11:40 am, 8 Sep 2011 | One Comment | 6,899 views]
श्री रामदेवरा जी

रामदेवरा पूर्वज इतिहास

आज से करीब 1000 वर्ष पहले दिल्ली पर तोमर वंशी राजपूत रजा अनंगपाल जी राज्य करते थे यह वंश चन्द्र वंशी था | इसी तोमर वंश में बाबा रामदेव जी से 36 पीढ़ी पहले तोमर नामक एक राजा हुआ करता था | इसी राजा ने अपने नाम से तोमर वंश चलाया और उसी दिन से राजपूत जाति को तुंवर जाति के नाम से जाना जाने लगा इसी वंश में पांडव हुए | यह वंश हमेशा भगवान श्री क्रष्ण की ही पूजा एवं महिमा गाते आ रहे है राजा अनंगपाल भी एक प्रकार से पराक्रमी एवं योग्य राजा …
[10:26 pm, 5 Mar 2011 | 2 Comments | 2,003 views]
श्री सद्रगुरु साईनाथ

गेहूँ पीसने की कथा :

एक बार साई बाबा मुँह हाथ धोने के पश्चात चक्की पीसने की तैयारी करने लगे । उन्होंने फर्श पर एक टाट का टुकड़ा बिछाया, उस पर हाथ से पीसने वाली चक्की में गेहूँ डालकर उन्हें पीसना आरम्भ कर दिया । बाबा के चक्की पीसने का समाचार शीघ्र ही सारे गाँव में फैल गया और उनकी यह विचित्र लीला देखने के हेतु सभी नर-नारियों की भीड़ मसजिद की ओर दौड़ पडी़ ।

उनमें से चार निडर स्त्रियाँ भीड़ को चीरता हुई ऊपर आई और बाबा को बलपूर्वक वहाँ से हटाकर हाथ से चक्की का खूँटा छीनकर

[7:57 am, 4 Mar 2011 | No Comment | 1,902 views]
शिवगोरक्ष चरित् – गोरखनाथ

महायोगी गोरखनाथ को शिवगोरक्ष खने की परम्परा प्राचीन काल से चली आ रही है | शिव योगेश्वर हैं | नाथ सम्प्रदाय मे उन्होने ही सबसे पहले मत्स्येंदारनाथजी को महायोगज्ञान का उपदेशाम्रत प्रदान किया था | नाथ सम्प्रदाय मे यह कहा जाता है कि शिव ने ‘गोरख’ के रूप मे मत्स्येंदारनाथजी से महायोगज्ञान पाया था | वे ही शिवगोरक्ष कहलाते है | गोरखनाथ को नाथदेवत कहा गया है | निर्मल स्फटिक के समान उनका गौर शरीर है, सिर पर जटा है, उनके तीन नेत्र हैं, वे माया से रहित है, वे तत्स्वरूप हैं, त्रिवेदस्वरुप हैं |

कल्पद्रुमतन्त्र मे गोरक्षस्तोत्रराज मे भगवान

[7:44 pm, 27 Feb 2011 | No Comment | 2,094 views]
अमरकाय गोरखनाथ
अमरकाय गोरखनाथ

शिवस्वरूप, नाथरूप महायोगी अपनी योगसिद्ध दिव्य देह मे अमर हैं | सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग – चारौ युगों मे ही जगत के प्राणियों के कल्याण के लिए अपने दिव्य शरीर मे प्रकट होते रहते हैं | जोधपुर के महाराजा मानसिंह ने जो अपने समय के प्रसिद्ध नाथ सम्प्रदायी थे, अपनी ‘श्रीनाथतीर्थवाली’ रचना मे गोरखनाथ जी के चारौ युगों मे विद्धमान रहने का संकेत 379 वें श्लोक – ‘प्रसिद्ध मेतन्नाथस्य स्थान युगचतुष्टये’ मे दिया है | गोरखनाथ जी स्वप्रकाश – स्वरूप महायोगी है | ‘श्रीनाथतीर्थवाली’ से ही पता चलता है कि उन्होने समय – समय पर भारत के

[2:06 pm, 17 Feb 2011 | One Comment | 2,241 views]
कबीर जी और गुरु गोरखनाथ
श्री मंछदरनाथ जी के शिष्य गुरु गोरखनाथ जी को प्रायः धर्म में आस्था रखने वाले सभी लोग जानते हैं . गुरु गोरखनाथ जी कबीर साहेब के समय में ही हुये और इनका सिद्धी ज्ञान विलक्षण था | उन दिनों काशी में प्रत्येक हफ़्ते विद्धानों की सभा होती थी और सभा के नियमानुर चोटी के विद्धान आपस में शास्त्रार्थ करते थे और बाद में जीतने वाला ग्यानी हारने वाले का तिलक चाट लेता था और जीतने वाला विजयी घोषित कर दिया जाता था | उन दिनों कबीर जी के नाममात्र के गुरु (ये रहस्य है कि रामानन्द कबीर जी के गुरु
[11:25 pm, 8 Feb 2011 | 9 Comments | 5,026 views]
श्री गोगापीर जी

राष्ट्रीय एकता व सांप्रदायिक सद़भावना का प्रतीक धार्मिक पर्व गोगामेडी (राजस्थान) में गोगाजी की समाधि स्थल पर मेला लाखों भक्तों के आकर्षण का केंद्र है। यह मेला प्रतिवर्ष भाद्रप्रद में शुक्लपक्ष पर लगता है और पूरे पखवाड़े तक जोर-शोर से चलता हुआ लगभग एक माह तक चलता रहता है। इस मेले में देश के कोने-कोने से श्रद्घालु आकर गोगाजी की समाधि पर धोक लगाते हैं व प्रसाद चढ़ाते हैं।

मध्यकालीन महापुरूष गोगाजी हिंदू, मुस्लिम, सिख संप्रदायों की सहानुभूति व श्रद्घा अर्जित कर एक धर्मनिरपेक्ष लोकदेवता के नाम से पीर के रूप में प्रसिद्व हुए। गोगाजी का जन्म राजस्थान के ददरेवा …

[6:10 pm, 8 Feb 2011 | No Comment | 1,149 views]
गोरख वाणी 2
गोरख वाणी

” पवन ही जोग, पवन ही भोग,पवन इ हरै, छतीसौ रोग,
या पवन कोई जाणे भव्, सो आपे करता, आपे दैव!
” ग्यान सरीखा गिरु ना मिलिया, चित्त सरीखा चेला,
मन सरीखा मेलु ना मिलिया, ताथै, गोरख फिरै, अकेला !”
कायागढ भीतर नव लख खाई, दसवेँ द्वार अवधू ताली लाई !
कायागढ भीतर देव देहुरा कासी, सहज सुभाइ मिले अवनासी !
बदन्त गोरखनाथ सुणौ, नर लोइ, कायागढ जीतेगा बिरला नर कोई ! ” …